जब तक मन कैकेयी ना हो तो कोई मंथरा हृदय परिवर्तन नहीं कर सकती

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“मंथरा ”                                                                                                                                               “तीन महीने से तुम्हारा देवर एक्सीडेंट कर के बैठा है ना जाने फिर से कब काम मिलेगा उसको… इतनी महंगाई में भी तुम कैसे उसका और उसके परिवार का बोझ ढो रही हो गायत्री…सोचो तुम्हारे खुद के भी बच्चे हैं…
पड़ोस की ताई की गायत्री भाभी से इस तरह की ना जाने कितनी बातों का बोझ लिए आज मोहन काम के लिए निकला…पर खाली हाथ और भारी मन लिए लौट कर अभी दरवाजे पर ही आया था कि फिर से ताई और भाभी की बात सुन दरवाजे पर ही ठिठक गया..
“तुम्हारे देवर देवरानी नज़र नहीं आ रहे है गायत्री…
“देवर जी इंटरव्यू देने गए हैं और देवरानी सब्जी के लिए बाहर गयी है…
“मैं फिर से कह रही हूँ गायत्री…कोई काम नहीं देता आज के जमाने में…तेरा पति इतना पैसा अपनी मेहनत से कमाता है सिर्फ अपने परिवार और बच्चों पर ध्यान दो मोहन उसकी पत्नी सुधा और बच्चो का बोझ लेकर मत झेलो…
गायत्री -ताई अपने कभी बोझ नहीं होते…और वैसे भी मोहन बिल्कुल लक्ष्मण समान भैया है वही सुधा देवरानी नही छोटी बहन है मेरी…
“तेरा दिमाग बिलकुल बंद हो चुका है गायत्री…
ताई और गायत्री भाभी की बातचीत सुन रहे मोहन ने देखा उसकी बेटी आराध्या गायत्री भाभी की गोद में आकर बैठ गयी …गायत्री भाभी ने उसे प्यार से एक निवाला खिलाया और.. प्यार करने लगी..
“ताई!आप मेरे ही गांव से हैं इसलिए मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ। मगर इस तरह की ही बातें करनी है आपको। तो जाते वक्त इस घर का दरवाजा अपने लिए बंद कर के जाइएगा…
ताई तेजी से बिना मोहन को देखे ही निकल गयी मगर वही मोहन बराबर उन्हें देख रहा था….और सोच रहा था
कि जबतक मन कैकेयी ना हो तो कोई मंथरा हृदय परिवर्तन नहीं कर सकती..!

Story, Family, Relations,

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